घर की मालकिन महिलाएं: एक भ्रम
आज में भारत औऱ विश्व स्तर पर महिलाओं की सुरक्षा की तुलना या फिर महिलाओं की स्थिति को लेकर बात करना चाह रही हूं।
एक
संस्थान का कर्मचारी होने के लिहाज से मुझे पोर्टल पर अपने मन की बात और
विचार कहने का हक नही हैं। संस्थान में वही बात कही जा सकती है, जिससे उद्योग को मुनाफा
हो। वहां, मुझे एक महिला होने से पहले एक कर्मचारी के लिहाज से सोचना पड़ता है,
लेकिन आज सोशल मीडिया इतना ताकतवर है कि आप कभी भी और कहीं भी बेझिझक अपनी बात
सबके सामने रख सकते है।
समाज
में महिलाओं का दर्जा आज भी पुरुषों के मुकाबले बहुत नीचा है। वहीं, इसे लेकर समय-समय
पर कई तरह की बातें सामने आती रहती है। आमतौर पर यही सुनने को मिलता है कि भारत
में महिलाएं बहुत ही सुरक्षित हैं। यहां तक कि कुछ लोगों का कहना है कि पूरे विश्व में केवल भारत ही एक ऐसा देश है, जहां महिलाएं को देवी का दर्जा दिया जाता है।
मेरे
आसपास कुछ पत्रकार लोगों का उठना-बैठना है। एक दिन दोपहर के खाने में बातचीत के
दौरान कुछ पुरुषों ने एक महिला से महिला सुरक्षा के मुद्दे को लेकर बात करना शुरू
किया। इस दौरान महिला का कहना कुछ इस तरह से था कि आज भारत में महिलाओं की
स्थिति बद्तर ही नहीं बल्कि दयनीय है, लेकिन उच्च अधिकारी पुरुषों का कहना था कि भारत
से अच्छी स्थिति महिलाओं की कहीं हो ही नहीं
सकती और न ही कहीं है.
एक
पुरुष महिलाओं के लिए अपनी पत्नी का हवाला देते हुए कुछ इस तरह के लफ्जों का इस्तेमाल करते है कि “ आज मेरी पत्नी को क्या कमी है। सुबह कुछ देर काम
करने के बाद वह शान से पूरा दिन आराम करती हैं, टीवी देखती है और घर की मालकिन
हैं। मेरी बेटी आराम से आज जिन्स-शर्ट पहनती है और बाहर धूमती है।
मैं आप
सबसे पूछना चाहती हूं कि ‘क्या सच में गृहणियां घरों की मालकिन है। मेरा इस
विष्य को लेकर विचार और सोचना कुछ अलग है। महिलाएं को घरों कि चाबियां और गहने भ्रम
में रखने के लिए दिए जाते है, जिससे वह पूरी उम्र खुद को किसी काबिल न समझें। असल
जिंदगी में घर के मालिक पुरुष ही है और वहीं रहेंगे।
घरों
में हमेश से पुरुष राज करते रहे है और यदि हमारे समाज की महिलाएं बदली नहीं तो आगे
भी पुरुष ही करते रहेंगे। आम जिंदगी की बात करें तो घरों में हमेशा वहीं होता हो
जो पुरूषों का कहना होता है, लेकिन वो करवाया महिला के माध्यम से जाता है। यहीं
कारण है कि घर में हमेशा बच्चों, बहुओं औऱ बेटियों को लिए बुरी मां और सास ही होती
है। हर काम में लोग क्या कहेंगे, समाज क्या कहेगा यह कहना पुरुषों का होता है,
लेकिन बच्चों तक पहुंचाया एक औरत के माध्यम से जाता है।
आज समाज में महिलाओं के प्रति अपराध बढ़ते ही जा रहे है. पूर्व काल में यह अपराध सती,
घूंघट, मार-पीट के तौर पर किए जाते थे और आज इन सबकी जगह दुष्कर्म, क्रूरता और
छेड़छाड़ ने ले ली है. महिलाओं का स्थिति कहें या सुरक्षा आज भी वहीं है जो
प्राचीन काल में हुआ करती थी।
एक ओर
महिलाएं आज पुरूषों से कंधे से कंधा मिलाकर चलती हैं। वहीं, दूसरी ओर महिलाओं को
बढ़ते देख उन्हें एक कदम पीछे रखने के प्रयासों में भी कोई कमी नहीं आती है।
कभी यह
कहकर की रसोईघर मे रोटी बनाना महिला का ही काम है या कभी यह कहकर की महिलाएं रात
के समय घरों के अंदर ही अच्छी लगती है। इस तरह की बातों से उनके मनोबल को गिराने
में किसी तरह की कमी नहीं रखी जाती है।
अत: यह कहना गलत नही होगा कि महिलाएं आज भी वहीं खड़ी है जहां इस सृष्टी
का निर्माण होने पर खड़ी थी। केवल कपड़ों, बातों और कुछ शहरों में रातों को बाहर
निकलने से इस समस्या का समाधान मुमकिन नहीं है औऱ न ही मुझे ऐसा कुछ नजर आता कहीं
दिख रहा है।
अगर आपको लगता है कि इन तरीकों से इसका सामाधान हो सकता है तो सबसे
पहले अपने घरों से महिलाएं की स्थिति ओर सुरक्षा को सुधारने का काम करें। मैं आपसे
महिलाओं को पुरूषों से एक कदम ऊपर नहीं बल्कि समानता का अधिकार दिलाने की बात कहना
चाहती हूं।


Absolutely right, well done
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